न्याय की लड़ाई में बहुत कुछ खोया ....
मेरा नाम योगेश आत्रेय है। मैं भाजपा का कार्यकर्ता हूँ और दिल्ली के मंगोल पूरी विधानसभा क्षेत्र से भाजपा की टिकट पर चुनाव लड़ चुका हूँ। अपनी राजनीतिक पारी कि शुरुआत से ही मैं जनता के मुद्दे उठाता रहा और उनको लेकर संघर्ष करता रहा। चूंकि दलित समुदाय से आने कि वजह से उनकी समस्याओं को मैं बहुत अच्छी तरह से समझता था, इसी लिए दलितों के उत्पीड़न के खिलाफ मैं बहुत मुखर रहा। जनता के बीच मेरी लोकप्रियता और काँग्रेस सरकार के खिलाफ निरंतर खड़े होने की वजह से कॉंग्रेस पार्टी की आँखों में चुभने लगा था। राजनीतिक रूप से वो मुझे परास्त नहीं कर पा रहे थे, इस लिए उन्होंने मुझे फ़साने के लिए एक षड्यन्त्र रचा। 2013 में विजय विहार थाने में मेरे खिलाफ तत्कालीन युवा कांग्रेस की महासचिव ने शिकायत दर्ज कराते हुए यह आरोप लगाया की मेरे द्वारा उसके साथ 2007 में बलात्कार किया गया था। रोहिणी कोर्ट में ट्रायल चला और अन्तः कोर्ट ने यह माना की बलात्कार का आरोप लगाने वाली महिला के बयान पर भरोसा नहीं किया जा सकता। पुलिस की जांच में तमाम दावे और आरोप झूठे साबित हुए। युवती ने अपनी शिकायत में मुझसे अपनी पहली मुलाकात और बलात्कार 2007 में होना का बताया जबकि एफआईआर 2013 में दर्ज़ कराई। इसके अलावा उन्होंने जिन-जिन होटलों और भवन में लगातार आना-जाना, मिलना और बलात्कार होना बताया वे सभी मोबाइल कॉलडिटेल्स और होटल के रिकॉर्ड की जांच के बाद झूठे साबित हुए। कोर्ट ने माना की आरोप लगाने वाली महिला पढ़ी लिखी है,सक्रीय राजनीति में है, पदाधिकारी है और निगम का चुनाव लड़ चुकी है। ऐसे में इनके दावों पर भरोसा नहीं किया जा सकता। तमाम सबूतों के आधार पर कोर्ट ने जुलाई 2018 में मुझको बाइज्जत बरी कर दिया।भले ही मुझे न्यायालय ने बरी कर दिया हो, लेकिन एक सवाल जो मेरे मन में हैं और जो शायद हमेशा ही बना रहेंगे। पाँच साल चले इस मुकदमे ने मेरे पूरे घर, परिवार, सामाजिक छवि, राजनीतिक करिअर और व्यक्तित्व को बर्बाद कर के रख दिया। अदालत की कार्यवाही के इतर जो मीडिया ट्रायल मेरे और मेरे परिवार के खिलाफ चला, उस मुकदमे में मुझे बिना सोचे समझे ही बस आरोप लगने पर मुजरिम बना दिया। और वो भी ऐसा वैसा मुजरिम नहीं – वहशी, दरिंदा जैसे असामाजिक अपशब्द मेरे लिए मीडिया द्वारा प्रयोग किए गए जिस कारण मैं और मेरा परिवार डिप्रेशन में चल गया। लोकतंत्र में मीडिया की स्वतंत्रता के पक्ष में मैं और मेरा संगठन पहले भी खड़े थे और आज भी खड़े है, लेकिन क्या उस मीडिया को भी आत्म-मंथन करने की आवश्यकता नहीं है, जो बिना सोचे-समझे किसी भी व्यक्ति के खिलाफ अपना ही एक ट्रायल चालू कर देती है जिसमे सजा भी तत्काल दे दी जाती है। क्या ऐसा कर के वो देश के संविधान और उस न्यायपालिका का अपमान नहीं कर रही जिसमे सभी नागरिकों के लिए समान अधिकार और अपने पक्ष को न्यायालय के समक्ष रखने का प्रावधान है? क्या वो उस व्यक्ति से कभी क्षमा मांगेंगे जिसके खिलाफ उन्होंने ट्रायल चलाया लेकिन जिसे न्यायालय ने दोषमुक्त कर दिया? मेरे साथ जो हुआ मुझे उसका दर्द तो है इसीलिए मैं नहीं चाहता कि भविष्य में किसी भी व्यक्ति का ‘मीडिया ट्रायल’ न हो। देश में महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा के लिए अनेकों कानून बने हैं जो बहुत जरूरी भी हैं। नारी की सुरक्षा से महत्वपूर्ण कुछ हो नहीं सकता और मैं मानता हूँ कि ऐसे कानूनों को सख्ती से लागू किया जाना चाहिए। लेकिन हमें यह भी ध्यान देना चाहिए कि कोई भी व्यक्ति इन कानूनों का दुरुपयोग न करे और किसी मासूम को गलत मामले में न फंसा पाए। क्योंकि जब ऐसा होता है तब उस आरोपी व्यक्ति के साथ-साथ उसके पूरे परिवार को अपमान झेलना पड़ता है। परिवार कि महिलाओं को इसका सबसे अधिक खामियाजा उठाना पड़ता है। ऐसे में यह ध्यान देने योग्य है कि महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए बने कानून किसी दूसरी महिला का परिवार न उजाड़ दे। पाँच सालों में जो मैंने खोया वो तो कभी मुझे वापस नहीं मिलेगा इसलिए मैं नहीं चाहता कि मेरे परिवार के साथ जो हुआ वो कभी किसी और के साथ हो। कानून का गलत इस्तेमाल करने वालों को भी कड़ी सजा दी जानी चाहिए। मुझे कानून पर, अदालत पर भरोसा था कि मुझे न्याय मिलेगा। कोर्ट के इस फैसले से मेरा ही नहीं बल्कि आम जनता का भी कानून और अदालत पर भरोसा बढ़ा है। और अंततः मैं मानता हूँ कि सत्य परेशान हो सकता पराजित नहीं।